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खुले तो चले

अभी-अभी लात-घूंसों का राजनीतिक महोत्सव शुरू हुआ है।

टिकट के लिए पैसा लगाने वाले-दिखाने वाले, समर्थन की सूचियां थमाने वाले-बनाने वाले लात-घूंसे चलाने और तोड़ने वाले सभी एक बात मानते हैं – यह तो लॉटरी है। लग गई तो परम आनंद वर्ना हरि ओम तत्सत्! टिकट और लॉटरी के इस पुनीत पर्व पर मैं आपको नब्बे के दशक की एक घटना सुनाता हूं। इसका पार्टी टिकट की लॉटरी से कोई संबंध नहीं है, परंतु यह देश सेवा की प्रत्याशा में पारस्परिक युद्धरत लोगों को वैसी ही प्रेरणा दे सकता है, जैसे कॉरपोरेट ऑफिसों में पॉवर पॉइंट प्रेजेन्टेशन देते सीईओ-सीओओ आदि को झेन कथाएं देती हैं।

किस्सा कुछ यूं है – बशीर दुबई में ड्राइवर था। बारह साल से अच्छी खासी नौकरी चल रही थी, पर एक दिन उसे नौकरी से हटा दिया गया। वो सुबह, जिस सुबह उसकी नौकरी गई, निश्चित ही कोई सबसे ज्यादा उदास रही होगी। अबूधाबी होते हुए, उसे फैसला करना पड़ा कि वह दक्षिण भारत स्थित अपने घर लौट ही जाए। लौटते-लौटते अबूधाबी हवाई अड्डे पर बशीर में किस्मत आजमाने की इच्छा ने जोर मार दिया। नौकरी थी नहीं, पर जो कमाए थे, उसमें से कुछ दांव पर लगाने की इच्छा उसे अबूधाबी इंटरनेशनल एयरपोर्ट स्थित ड्यूटी-फ्री दुकान ले गई, जहां उसने 500 दिरहम का एक लॉटरी टिकट खरीद लिया। नौकरी गई तो थोड़े दिरहम और गए समझो, यही सोचा था बशीर ने। मगर, किस्मत खुल गई। नौकरी से निकाला गया आदमी घर लौटा तो पांच लाख दिरहम (50 लाख रुपए) का इनाम जीत कर लौटा था।

आप इसे किस्मत का खेल कह सकते हैं। कोई इसे नौकरी छोड़ने का शुभ प्रतिफल कहना चाहेगा। जब आदमी की नौकरी छूट जाती है, तो उसे लगता है कि एक लगी लगाई बगिया उजड़ गई। मगर जल्दी ही उसे पता चल जाता है कि यहां तू क्या लाया था, जिसके जाने का गम है और तूने क्या पैदा किया, जो उसके अपने पास न होने की दुखी तस्वीर बनाता है? यह निराशा चरम पर जाती है तो लॉटरी सामने आती है। सट्टा चलता है, जुआ चलता है या लॉटरी चलती है तो इसी गीता के सिद्धांत पर चलती है – ‘तेरा क्या था जो चला गया?’ निराशा अंत में सही आदमी में आमतौर पर साहस भी पैदा करती है। आत्महत्या या हत्या दोनों में साहस चाहिए और इसके पीछे घोर निराशा की जरूरत पड़ती है। व्यवस्था से निराश आदमी भी हाथ में चाकू ले सकता है, लेकिन यह इसका दूसरा रूप है। यह निराशा, आशा की एक किरण की तलाश में हथियार बन जाती है। दूसरी किस्म की निराशा, बची-खुची मोमबत्तियां भी बुझाकर अंधेरा करती है।

कभी दिल्ली की सड़कों पर शाम के वक्त एक नंबर वाली लॉटरी के हजारों टिकटों की रंग-बिरंगी बिसात लग जाती थी। लगता था जैसे लॉटरी के गलीचे पर चलते हुए कितनी ही कराहती आशाओं पर आपके चरण फिरे जा रहे हैं। आशा की गिट्टियों पर नंबर न खुल पाने का डामर और कल फिर एक टिकट खरीद लेने की इच्छा का जोरदार बुलडोजर किस्मत की नई सड़क बनाने में लग जाता। कई प्रदेशों में आशा की यह मुहिम कुछ लोगों को नहीं जमी तो उन्होंने लॉटरियां बंद करवा दीं। यार लोग तब अपनी आशाएं असम, मणिपुर, नगालैंड वगैरह की ओर मोड़ चले, जहां लॉटरियां चालू थीं। वहां टेलीफोन पर आशाओं के नंबरों का खेल शुरू हो गया।

लॉटरी चूंकि सरकारी मामला है, इसलिए इसे खरीदने में सामाजिक प्रतिष्ठा का ह्रास नहीं होता। पर जुआ-सट्टा खेलते दिख जाओ तो मध्यवर्गीय परिवारों में तो लोग मान लेते हैं कि ये हाथ से गए। सरकार समझदार है। उनकी प्रतिष्ठा का उसे बहुत ध्यान है, – जो जुआ भले ही खेलते हों उसे वोट तो देते हैं। इसलिए सरकारी स्तर पर कैसिनो खोलने का धंधा शुरू किया गया है। प्रतिष्ठा भी धीरे-धीरे बंटेगी, हिसाब से बंटेगी, इसलिए पहले वहां सिर्फ विदेशी मुद्रा से जुआ खेला जा सकेगा। वैसे मेरा सुझाव है कि इन कैसिनो का संचालन देशी सट्टा संचालकों के हाथ में दे देना चाहिए। इन्होंने ईमानदारी का कीर्तिमान कायम किया है। आज तक ऐसा एक केस नहीं है कि सट्टे का नंबर मुंबई से जो खुला हो वो दूर देश के अनाम गांव तक एक-सा न पहुंचा हो और यह भी किसी को कायदे के मुताबिक जीते हुए रुपए न मिले हों।

ड्राइवर बशीर ने अबूधाबी हवाई अड्डे पर जो कुछ पाया, उससे मुझे आस लगी कि हमारे देश के ड्राइवर यानी प्रधानमंत्री जब कभी उधर यात्राओं पर जाएंगे तो अब एकाध टिकट खरीद लिया करेंगे। कभी खुल गया तो देश के किसी कर्ज की एकाध किस्त तो चुक जाएगी।

लेकिन बशीर ने नौकरी छोड़ी थी, तब टिकट खरीदा था। प्रधानमंत्री की नौकरी कोई देश के कर्जों की किस्तें चुकाने के लिए भला क्यों दांव पर लगाएगा?

इसे देश सेवा के लिए टिकटों की मारा-मारी करने वालों से बेहतर कौन समझेगा?

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