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दिल्ली में पहाड़-पहाड़ आंसू

सारे नेता गायब हैं। सारी राजनीतिक क्रांति धरी हुई है। जब उत्तराखंड की पिछली सरकार बन रही थी, तब हरीश रावत के चलते कांग्रेस दिल्ली-दिल्ली

हो रही थी। आखिर विजय बहुगुणा पैराशूट से उतरे और आकर बैठ गए। वे अभी भी यहां विनाश के तीसरे दिन दिल्ली में प्रेस कान्फ्रेंस करके गए, जबकि उन्हें घाटियों में सेना के बीच होना चाहिए था।

पाठकों को शायद याद हो कि भयानक त्रासदी के बीच एक महाकवि का जुमला पहले खूब चला था, ‘मरने वालों के साथ कोई मर नहीं जाता।’ यह कहने के समय वे विश्वकविता सम्मेलन कर रहे थे। वे फिर भी कवि थे और सोचते होंगे कि सचमुच मरने से अच्छा है जीवन के गीत गाना। मगर, एक राजनेता और गजब के थे। उन्होंने कहा था, ‘क्या सुनामी में उनके साथ जाकर मर जाएं?’

बाढ़, सूखा, भूकंप वगैरह जब भी आते हैं, हमारे लीडर हाथ थामकर आपको उठाते नहीं, हवा में तैरते हुए ‘टा-टा’ करते हैं। उनका मानना होता है कि कोयला घोटला और कॉमनवेल्‍थ घोटाला ज्यादा काम की चीज है, मन उसमें लगाना चाहिए। एक कवि मिले। पहाड़ से कोई दो दशक पहले उतरकर राजधानी के पुल पर हवा खा रहे थे। यहीं से उन्होंने पहाड़ पर एक कविता लिखी और दिल्ली हिल गई। उस हिली हुई दिल्ली पर हाथ आजमाते हुए कितना वक्त गुजर गया पता नहीं चला। अब भी जब पहाड़ हिलता है, दिल्ली उन्हें स्मरण करती है। दिल्ली में उनका अपना पहाड़ है।

‘आप इस समय पहाड़ों पर जाकर कोई मदद करने की योजना क्यों नहीं बनाते?’ ‘योजना सरकार बनाती है। त्रासदी से जनता को निपटना है। मैं क्या कर सकता हूं।’ ‘व्यावहारिक स्थिति तो यही है। आदमी काम की तलाश में कठिन परिस्थितियों से निकलकर मैदान में आता है और फिर कठिन में लौटने का शौक कैसे पाल सकता है?’ ‘आप व्यावहारिक शब्द का इस्तेमाल करके मेरे पहाड़ प्रेम पर तंज कस रहे हैं। आपने पहाड़ की मुसीबतें देखी हैं? आप तो पिकनिक वाले हैं।’

‘बिल्कुल ठीक। मैंने समंदर के किनारे मछुआरों की मुसीबतें भी नहीं सही हैं। मैंने जलते मरुस्‍थल में उठती लपटों के बीच पानी की तलाश करते ऊंट वालों की तकलीफें भी नहीं सही हैं। मैंने मुगलसराय के रास्ते लुटने, रायपुर के रास्ते आहृत होने या गुवाहाटी के रास्ते मरने का अनुभव भी नहीं लिया है। मगर पता नहीं क्यों, मैं आपकी कविता इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में सुनकर पहाड़ को श्रद्धांजलि देते हुए निवृत्त होने की मनः स्थिति में नहीं आ पा रहा हूं।’ ‘आप सनातन दुखी हैं। टुच्चे हैं। ओछे हैं। कवि को नहीं समझते। कवि दो कविताएं और लिख सकता है। कोई राहत टीम थोड़े ही बना सकता है।’

‘पर कवि सांप्रदायिकता पर एक सुरक्षित जुलूस निकाल सकता है। इनाम देने वाली कमेटी पर ज्ञापन दे सकता है। अध्यक्ष आदि-इत्यादि की नियुक्तियों पर आंदोलन चला सकता है।’

‘आप न क्रांति को समझते हैं, न अर्थशास्‍त्र, समाजशास्‍त्र और शोषण की राजनीति को। यह एक वृहत्तर समस्या है। कॉरपोरेट भूख की, नदी की लूट की…..। इससे निपटने के लिए मैं एक घोषणापत्र और लंबी कविता लिखने की प्रक्रिया में हूं।’ ‘अभी फंसे हुए लोगों को भूख से बचाने के लिए टीम की जरूरत है। कॉरपोरेट भूख से अलग से लड़ लेंगे। पहले इस टीम में शामिल हो लेते हैं।’

‘यह करना है तो किसी आश्रम से बात कर लो। बड़े-बड़े मठ हैं। ये क्या करेंगे?’ ‘पर आप नहीं चलेंगे? सुना है आप नहीं गए तो मोदी उधर जा सकते हैं।’ ‘छोटे दर्जे की ओछी राजनीति है।’ ‘राहुल नहीं दिखे।’ ‘घोर सांप्रदायिक सवाल है।’ ‘आप अपनी एक ताजा कविता दे दीजिए। मैं ध्वस्त घाटी की दिशा में पढ़ूंगा।’ ‘मेरा पुराना संग्रह है। उसमें एक प्रासंगिक कविता है। निकाल लो और पढ़ लो।’ ‘आंसू भी पुराने ही निकाल लूं?’ कवि ने अजीब सी उदासी और उबलते गुस्से में मोबाइल फेंक दिया। काम का वक्त हो रहा था। पहाड़ों पर जमीनों का धंधा करने वाली कंपनी में क्रांति का एक पर्चा निकालने की नौकरी थी। हम खामोश हैं। दोनों पहाड़-पहाड़ आंसू लाना चाहते हैं। कवि कहता है, अब कविता पढ़ भी लो!

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