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नर्क की उक्तियां

बदला लेने की कोई जरूरत नहीं। बस शांति से बैठो और इंतजार करो। तुम्हें दुख देने वाले खुद-ब-खुद निपट जाएंगे। अगर तुम्हारी किस्मत अच्छी है, तो ऊपर वाला तुम्हें यह सब देखने का मौका भी देगा।


    - संजीव खन्ना, 12 अप्रैल, 2012

    सह-आरोपी, पूर्व पति, इंद्राणी मुखर्जी, फेसबुक पर



इंद्राणी बोरा-दास-खन्ना-मुखर्जी की जीवन यात्रा का एक नर्क जब आप देख रहे हैं, तब अनायास इस प्रकरण के एक पात्र संजीव खन्ना की फेसबुक पर 'कर्मा' संबंधी सूक्तियों का एक अंबार भी बरामद हुआ है। यह अंबार जीवन दर्शन, आत्म साक्षात्कार, हताशा और अज्ञात विश्वासों का विचित्र मिश्रण है। हत्या के बीच 'आत्म' है। 'आत्म' के आगे फलसफे की चादर है।


क्या वजह है कि सूक्तियां हत्यारों के बीच भी कमाल करती हैं? वे विरेचन करती हैं। आपको तिनके का सहारा देती हैं। उठाती हैं, सहलाती हैं, जस्टिफाई करने का हथियार देती हैं। आधे से ज्यादा सेल्फ हेल्प का कारोबार सूक्तियों-बोधकथाओं पर टिका है। वे फिर-फिर पढ़ी जाती हैं। फिर-फिर दोहराई जाती हैं। कई लोग उसके नशेलची हो जाते हैं। रोज एक सूक्ति न मिले, तो उन्हें बेचैनी हो जाती है। ऐसे में सूक्ति उनके लिए मार्फीन का इंजेक्शन भी बन जाती है।


पर अक्सर, एक अच्छी बात कहने वाले का अर्थ यह होता है कि वह उस अच्छे को अच्छा समझता तो है।


एक कवि थे। वे बड़ी सुंदर कविताएं लिखते थे। व्यक्तिगत नैतिकता के स्तर पर वे मनोविकृतियों के कुरूप संयोजन थे। व्यभिचार के पक्ष में वे वैज्ञानिक तर्कवाद का तूमार खड़ा करते थे। प्रवृत्ति से वे साहित्य के आसाराम थे, लेकिन प्रतिष्ठा प्लूटो की मांगते थे। गंभीरता उन्हें स्त्रियों को लांछित करने वाले लतीफों से मिलती थी, जिन्हें वे यौन कुंठा के बजाय नारी स्वातंत्र्य के मुक्त भाव का आह्वान कहते थे। उन्होंने कभी किसी पड़ोसी की मदद नहीं की। उन्होंने लाभ के लेन-देन किए, लेकिन लिए हुए पैसे लौटाने को अनावश्यक समझा। पर जब भी कभी शारीरिक दुख आता था, बुद्ध की सूक्तियों से महाप्राण हो जाते थे। सूक्तियां और बोधकथाएं, उन्हें भी कायर आत्मा से संघर्ष के लिए जरूरी जान पड़ती थीं। तब वे भीतर के दानव की दयनीयता के प्रारूप हो जाते थे।


दिलचस्प यह है कि इसी दौरान कविताएं लिख जाती थीं। उनका एक निजी सेवक, मुहल्ले में उनसे ज्यादा लोकप्रिय था, क्योंकि उसके पास प्रेम-संवेदना के समृद्ध खाते थे। वह आदमी था। ये कवि थे। ये अपने कवि को आदमी बनाने के लिए संघर्ष करते रहे, आदमी ने एक सूक्ति सुनाई-'पानी-पानी की बात है। रहता सब में है। किसी का उड़ गया, उड़ा है तो बादल बनकर फिर आएगा। फिर गिरेगा। तब झेल लेना।'


कवि ने इस सूक्ति को ट्रॉफी की तरह सबको दिखाया। सेवक को चमकती दुनिया नहीं जानती, कवि को सब जानते हैं।


इंद्राणी मामला इस तरह सामने न आता, तो स्वर्ग के चरित्रों की जगमग दुनिया तो चल ही रही थी। वही सत्य आजीवन दिखता, चलता, इतिहास में चला जाता। कई जीवन ऐसे चले जा रहे हैं। कवि की कविताएं ही इतिहास में जानी हैं, अगर दूसरा नर्क, नर्क की तरह प्रकट न हो जाए। पर अगर इस स्वर्ग का नर्क प्रकट होता है, तो भी फलसफा ही आसरा देगा।

सारे सेलिब्रिटी अपने दैत्य के सार्वजनिक होने पर बीइंग ह्यूमन की सूक्तियां बोलते हैं और लंबी पेरोल का मोक्ष पाते हैं। बड़े-बड़े विचार फांकने वाले आत्मतर्पण करके छुट्टी पाते हैं।


इस 'अच्छी बात' में आखिर क्या चुंबक है? महाबली होने पर भी लोग अच्छी-अच्छी सूक्तियां देते हैं, असहाय हो जाने पर भी श्रेष्ठतम सूक्तियों की शरण में गिर जाते हैं।


वैज्ञानिक कहते हैं, हर आदमी में अंततः एक आदमी होता है। उसे सत्य का पता होता है। उसे आत्मिक न्याय की उजली मूर्ति दिखती है। पर आंख बंद करके पाप का आनंद जब महत्वाकांक्षा की सीढ़ी चढ़ जाता है, तो वह उसी मूर्ति की कृत्रिम थ्री-डी बनाकर बाकी का मुंह उधर कर देता है। इस प्रक्रिया में वह इतना लिप्त हो जाता है कि जब तक पराभव न हो जाए, सूक्तियां बोलता रहता है। सूक्तियां, कैचलाइन हो जाती हैं।


सच्ची सूक्तियां अदम्य होती हैं। लफंगई में लगे लड़कों को भी चेग्वेरा के चित्र और क्रांति की सूक्ति से जड़े सस्ते टी शर्ट में आपने देखा होगा। यह अच्छाई के आत्मिक बाजार का अज्ञात कुलशील संस्करण है। दोहे, शेर, चौपाई, यहां तक कि कई बार अकेला शब्द तक शक्ति और सत्य का सौंदर्य लिए चलते हैं। हम उनके पीछे मुंह छिपा सकते हैं। संवेदनाओं की परखनली को दिल की लैबोरेटरी में हिला सकते हैं। व्हाट्स ऐप के ज्ञानियों का नब्बे प्रतिशत साहित्य जीवन-दर्शन की सूक्तियों का महाविस्फोट है। इतने संतत्व से तो समस्य पीढ़ियां राधे मां-निर्मल बाबा से मुक्त हो सकती है।


लेकिन, ऐसा नहीं होता।


आदमी बोधकथाएं पढ़ता है, सूक्ति बांटता है, जब बुरी तरह डरता है तो महामृत्युंजय जपता है। अंततः डर इतना हो कि वही निष्कर्ष अंतिम हो जाए, तो वह हत्या में फंसे संजीव खन्ना की तरह फेसबुक पर कर्म सिद्धांत के वचनों का वाहक हो जाता है।


सूक्तियों में यही जादू है कि वे निष्फल नहीं होतीं। उन्हें कैचलाइन में तब्दील करने वाला नर्क भी जब ध्वस्त होता है, तो वे चमकीली लाट की तरह अनंत में शिखर के साथ खड़ी हुई आमंत्रित करती हैं।


इंद्राणी मुखर्जी चमकती हुई कैचलाइन थी। कुछ ने सूक्ति बनाकर चला दिया।


सूक्तियां हंस रही हैं। कितने स्वर्गों के रास्ते कितने नर्कों से जाते हैं?



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