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प्रतिपक्ष की सेल्फी


इस दौरे सियासत का इतना सा फसाना है बस्ती भी जलानी है मातम भी मनाना है अभी कुछ ही वक्त पहले की बात है। एक उम्मीदवार मंच से खड़े-खड़े ऐलान कर रहे थे- 'मैंने नेताजी से बात कर ली है। दस तारीख आने दीजिए। यहां जो लोग हैं उनका एक महीने तक कोई ट्रांसफर नहीं होगा। पहले उनसे अब तक का सारा हिसाब लिया जाएगा, फिर कहीं भेजा जाएगा।' यह एक बयान नहीं, उस अहंकार की आहट थी, जिससे जनतंत्र के बहाने हिसाब चुकाने की बू आती थी। जैसा कि एक वरिष्ठ नेता ने मुझे बेहद ईमानदारी से कहा, 'हमें दूसरों की कमजोरियां चुनने का शौक है। अपनी खासियत पैदा करने का वक्त ही नहीं मिलता। इसलिए हमें दोष मत दीजिए। आखिर जीत-हार तो समीकरण से ही होती है। क्यों बाकी बातों में वक्त खर्च किया जाए।' उन्होंने ही दूसरी ईमानदारी पेश करते हुए कहा, आज की नैतिकता यह है कि दूसरों की अनैतिकता को कितना बड़ा पेश किया जाए। झूठ-सच तो हवा से ब नता है। हम हवा बनाने में लगे हैं। आप तर्क और सिद्धांत गढ़ते रहिए।' यह इस बात की पुष्टि करने के लिए काफी था कि विपक्ष, मोदी-विरोध और जाति-समीकरण के नाम पर शोर के अलावा अपने किसी तरीके में बदलाव के लिए तैयार नहीं है। वह अपने भ्रम के परदे में अपनी तस्वीर देखता है, उस पर रीझता है और हर एक हार पर एक नई कहानी गढ़कर खुद को बहला लेना चाहता है। जब दो महीने पहले नवजोत सिंह सिद्धू ने पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा लिख दिया था, तभी साफ हो गया था कि कांग्रेस ने सिद्धू को सिर चढ़ाकर कितनी बड़ी गलती की है। मगर कांग्रेस का अपना नशा है। वह स्वयं को नष्ट करने के अपने उपाय खोजती है। दूसरे संभावनाशील राज्य उत्तराखंड में हरीश रावत ने कुछ वक्त पहले ही ट्वीट किए थे कि कांग्रेस के भीतर वे कितना फंसा हुआ महसूस कर रहे हैं। पंजाब और उत्तराखंड दोनों जगहों पर कांग्रेस के नेता एक दूसरे से ही संघर्ष में लगे थे। कहना बेकार है कि यूपी में मुस्लिम-यादव और जाट-मुस्लिम की बाट जोहते विपक्ष ने इसके 'रिपल इफेक्ट' की कोई परवाह नहीं की। 'दस तारीख से निजाम बदल रहा है' कहकर चेतावनियां जारी करने से निजाम नहीं बदलता। पिछले आठ सालों में अगर भाजपा ने अपना वोट प्रतिशत चालीस तक छू लिया है तो यह साफ है कि वह ध्रुवीकरण के 'विपक्षी दांव' की उलट लाभार्थी रही है। भाजपा पुरानी 'बनिया पार्टी' नहीं रही बल्कि दलितों और पिछड़ों के बीच उसने अपनी जगह खोज ली है। वे लोग जो जातियों की ठेकेदारी से हर चुनाव में मोलभाव करते रहे हैं, वे भी स्तब्ध रह गए हैं। एक वोट बैंक जो अति दलितों-अति पिछड़ों का है, वह दिशा बदल रहा है। राशन, गैस और सुरक्षा जैसी बातें उसमें उतर गई हैं। 370, पुलवामा, रामंदिर, तीन तलाक, काशी विश्वनाथ धाम, आदिशंकर रामानुजाचार्य - ये सब केक पर लगी 'आइसिंग' है। जिस समीकरण को हर पार्टी साधती रही है, उसी समीकरण को भाजपा भी साध रही है। वर्ना मणिपुर और गोवा न होते। इस साधन-सिद्धि की मोदी शैली ने योगी के प्रतीक को राजनीति के मुहावरे में बदल दिया है। अब रहे केजरीवाल, वे 'हारों के सहारे' हैं। जहां-जहां कांग्रेस ने 'वैक्यूम', 'खला' या 'खाई' छोड़ी है, वहां वे हनुमान चालीसा और भविष्य के संतोष के रूप में चलायमान हैं। जब आदमी सब प्रयोगों से हताश हो जाता है तो वह नीति-सिद्धांत नहीं पूछता। वह नहीं पूछता कि आप वामपंथी हैं या दक्षिणपंथी? वह विचारधारा से ज्यादा, परेशानहाल लोगों के प्रत्युत्तर पर चिपक जाता है। यह चिपका हुआ स्टिकर एक धीरज, एक आशा, एक गहरी सांस के लिए कभी-कभी काफी होता है। यह बेजार लोगों के परचम में बदल जाता है। कांग्रेस ने जिस कदर अपने तरीकों से अपने नेताओं-कार्यकर्ताओं तथा मतदाताओं दोनों को निराश किया है - उसमें कोई अन्य जगह तलाश ले तो आश्चर्य ही क्या? ये चुनाव नतीजे सर्वाधिक महत्वपूर्ण इसलिए हैं कि वे सिखाते हैं - सिर्फ ट्विटर-फेसबुक पर 'भेड़िया आया-भेड़िया आया' चिल्लाना ही, अंतिम सत्य नहीं है। चुनी हुई चीजों को अपने एजेंडे के हिसाब से प्रस्तुत कर देना ही सफलता की गारंटी नहीं है। सचमुच भीतर झांकना होता है और जनतांत्रिक प्रक्रिया में शामिल सभी तत्वों को साधना भी होता है। 'रणनीति की जीत' या 'झूठ की जीत' या 'सच की हार' कहकर यदि अभी भी प्रतिपक्ष छुट्टी मनाने चला जाएगा, तो जवाब कहां से आएगा? Amar Ujala Fri, 11 Mar 2022







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