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हिंदी के मुहल्ले में कवि और आदमी

हिंदी के कवि ने मुहल्ले के नल पर पानी भरती लड़कियों पर एक कविता लिखी। फिर उसे छपवाकर मंडली में काफी वाहवाही पाई। उसकी अब इच्छा थी कि नल पर ही उसका सम्मान हो। पर जब वह सम्मान-स्थल पर पहुंचा, तो न लड़कियां आईं, न नल चला, सिर्फ फिक्स मंडली जो चाय-समोसे के प्रेमी थे, इकट्ठे होकर निकल लिए। कवि परेशान है। वह मुहल्ले के लिए लिखता है, पर मुहल्ले वाले उसकी जरा इज्जत नहीं करते।

वह दूरदर्शन के डाइरेक्टर के साथ संध्या-पान करता है, देश बचाओ विज्ञप्ति पर दस्तखत करता है, अखबार में आह्वान की तरह उसे छपवाने की व्यवस्था भी करता है, लेकिन पड़ोसी उसे नमस्ते तक नहीं करता। किसी दिन दंगा हो जाए तो कवि कैसे बचेगा? उस समीक्षा की कटिंग से जो पिछले रविवार उसके मित्र ने आधे पेज में खींच दी थी? आधे पेज में बाल बढ़ाने का विज्ञापन छपता तो लाख रुपये का धंधा हो जाता। कविता बाल बढ़ाने से भी पिट गई। वह देश के लिए, मानवता के लिए,धर्मनिरपेक्षता के लिए प्रेस क्लब की कोने वाली सीट पर बहस करता है, लेकिन गली में उसकी आवाज पर लोग जेबकतरे को पकड़ने तक नहीं दौड़ते।

यह क्या संकट है? कवि कहता है, यह हिंदी की दुर्गति है। यह हिंदी समाज की शर्मनाक उदासीनता का नमूना है। हिंदी का मुहल्ला एक कवि की इज्जत नहीं कर सकता, तो हिंदी का हाल यही होगा। हिंदी मरेगी एक दिन।

बस में लटके कवि का गैर-कवि सहयात्री कहता है, मोदी को सौ दिन हुए और डेढ़ सौ किताबें उस पर आ गईं। मतलब लोग किताबें खरीदते तो हैं। हिंदी मरेगी कैसे? कवि कहता है, पर कविता संग्रह छापने से प्रकाशक डरते हैं। हिंदी का समाज कवि की इज्जत नहीं करेगा तो डूब जाएगा।

सहयात्री सोचता है, कवि कविता की जगह एक नाव बना दे तो उसमें चढ़ बैठे, ताकि जब डूबने की घड़ी आए तो जान बचाने का सामान हो। कवि कहता है, नाव बनाना मामूली काम है। वह ऐसे मामूली काम क्यों करे? वह रचनात्मक काम के लिए पैदा हुआ है। वह कविता बनाता है। नाव तो किसी ऐरे-गैरे से बनवा लो जो लकड़ी ठोंकना जानता हो, कवि तो कविता ठोंकता है।

कवि आगे बढ़ता है। सब्जी मंडी पहुंचता है। करेले के भाव, बैंगन और कद्दू के भाव पर बहस करता है। सब्जीवाला उससे भी ऐसे ही पेश आ रहा है, जैसे पड़ोस में खड़ी बहिनजी से। कवि का मन करता है, कि कविता ठोक दूं तो सब्जीवाला मेरे विचार का भाव, करेले के भाव से मिलाते ही बेहोश हो जाएगा। उसे आधे घंटे बाद ध्यान आता है कि बहनजी सब्जी लेकर चली गई हैं, पर वह करेले के ढेर को ही देख रहा है।

सब्जीवाला उसे हटने को कह रहा है। कविता करेला नहीं देती! अजीब हिंदी समाज है, कविता, करेले के सामने भी सम्मान से वंचित रहने को अभिशप्त है। अब तो हिंदी जरूर मरेगी! कवि क्रोध में आ जाता है और ऋषि मुद्रा में शाप देता है। तभी सब्जीमंडी में घुस आई गाय से हड़कंप मच जाता है। कवि बचने के लिए एक गुमटी में घुस जाता है।

कविता मरखनी गाय से भी नहीं बच पा रही! हिंदी समाज की गाय भी कवि का सम्मान नहीं जानती। गाय क्रांति-विरोधी है। कवि के मुंह से एक कविता फूट पड़ती है। गुमटी वाला कहता है, बाहर निकलो, भीतर दो टोकरे भिंडी के रखने हैं, जगह नहीं है।

कवि एक मामूली भिंडी से अपदस्थ होकर बाहर आ जाता है। उसकी कविता फूटना चाहती है पर भिंडी, करेले, गाय, बहनजी-सब हिंदी समाज के निकृष्ट सदस्य हैं। कविता का मोल नहीं जानते, कवि का मान कैसे रखेंगे?

कवि बिजली का बिल भरने की लाइन में लगा है। घंटे बीतते जा रहे हैं, लाइन खिसक रही है। उसे कोई अपनी जगह नहीं दे रहा। उसका मन कहता है, एक कविता ‘कौआ और बिजली का तार’ बोल दूं तो सब हिल जाएं। क्लर्क खुद खिड़की से कूदकर बिल लेने चला आए। पर पड़ोसी उन्हें घूरे जा रहे हैं। कवि सशंकित है। उसे लगता है, लाइन में सभी हिंदी के प्रतिक्रियावादी और प्रतिक्रांतिकारी खड़े हैं।

कविता, बिजली के बिल जमा कराने की लाइन भी तोड़ नहीं पा रही। हिंदी की यथास्थिति कैसे तोड़ेगी?

बिजली के बिल जमा करने में अठन्नी के खुल्ले का चक्कर पड़ गया है। कविता, अठन्नी से भिड़ रही है। कवि बिजली के क्लर्क से भिड़ रहा है। किसी तरह मामला पीछे खड़ा नागरिक संभालता है। अठन्नी दे देता है। कवि की प्रसन्नता का पारावार नहीं है। यह नागरिक कविता की कीमत जानता होगा। वह धन्यवाद देने के लिए मुड़ता है। नागरिक कहता है, निकलो यार! मेरा नंबर लगे, अठन्नी के चक्कर में आधा घंटा बरबाद कर दिया।

कवि टूट जाता है। उसकी कविता ने अठन्नी नहीं बचाई थी, नागरिक की व्यग्रता ने उससे पीछा छुड़वाया था।

कवि ने आज बहुत धक्के खाए। हिंदी समाज को वह कविता देना चाहता था, समाज उसे अपनी ही तरह धक्के खाने में शामिल मानकर चल रहा था। कविता, कवि को जानती थी, जनता कवि को जन से ऊपर मानने को तैयार नहीं थी।

कवि परेशान है। क्रोधित है। गमले तोड़ रहा है। बोतल खाली कर रहा है। सर्वहारा पर बड़-बड़ा रहा है। बालकनी से हिंदी समाज की दरिद्रता पर शब्दावलियां फेंक रहा है। पर हिंदी समाज उसे कुछ समझता ही नहीं है।

कवि हिंदी का वीवीआईपी होना चाहता है, पर हिंदी को साधारण मनुष्य चाहिए। उसे जिंदगी के नल को ठीक करने वाला मामूली प्लंबर चाहिए। उसे अपने जैसा, अपने बीच का, जीता-दुख पाता-जिलाता साथी चाहिए।

कवि आदमी हो जाए तो हिंदी समाज कविता हो जाए।

कवि इंडिया इंटरनेशनल सेंटर बैठा हिंदी दिवस पर सोच रहा है, वह आदमी बन गया तो कविता कौन करेगा?

*और अंत में …..

“हृदय की बांसुरी के लिए दिमाग के जंगल में बांस खोजने वाले महान खोजी होते हैं। लेकिन ऐसे खोजियों से बांसुरी की धुन किसी ने कभी नहीं सुनी!” -के रामेश्वर ने भेजा

*Illustration with this post : Indiatimes

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