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विलक्षण एकांत

Updated: Nov 17, 2020


रियो ने कहा, यह बकवास है।

अगर कोई अपने सुख को ज्यादा पसंद करता है तो उसे शर्म नहीं महसूस करनी चाहिए। यह तो सही है, रैम्बर्त ने जवाब दिया, लेकिन जब सब दुखी हों तो सिर्फ अपना सुख हासिल करने में शर्म महसूस हो सकती है।


भय, आतंक, मृत्यु और बहुविध विनाश की आशंकाओं के बीच अल्बैर कामू के प्लेग के ये दो चरित्र इस वक्त सर्वाधिक याद आने वाली चीजों में से एक हैं। ऊपर का संवाद प्रियतमा के लिए महामारी ग्रस्त शहर छोड़ने की कई कोशिशों के बाद फैसला बदलने वाले पत्रकार रैम्बर्त और डॉ. रियो के बीच बातचीत का अंश है। फ्रांस के उपनिवेश, अल्जीरिया के उस शहर में प्लेग फैला हुआ है। सीमाएं सील हैं। जब शहर का हर आदमी, शहर से भाग निकलने की फिराक में है, आत्म-सुरक्षित समाज के हिस्से, पत्रकार रैम्बर्त की कामना भी उनसे अलग नहीं है। लेकिन जब वह फलीभूत होने को ही होती है, कि उसका आत्म जाग उठता है – ‘जब सब दुखी हों तो सिर्फ अपना सुख हासिल करने में शर्म महसूस हो सकती है।’ महामारी ऐसी चीज है जिसमें हर क्षण जीवन, दूसरे क्षण शून्य की आहट झूलती रहती है। कुछ लोग युद्ध में भाग लेते हैं, कुछ युद्ध से भागते हैं, कुछ उसी में अपना मुनाफा काट लेते हैं। उसी में रियो, रैम्बर्त और जीन तारो जैसे चरित्र मानव के अपराजेय साहस और सुख-दुख की सच्चाई का साफ-साफ हिसाब करते हैं। इस वक्त अति आशा और तीव्र निराशा के दो सिरों के बीच घट रही कुछ कोरोना-कथाएं जैसे अचानक कामू की किताब से कुछ किरणें समेटने को कह रही हैं। क्या धुंधली उत्साहहीन आशाओं की विज्ञप्तियों से इस भय का मुकाबला किया जा सकता है? जाहिर है, नहीं! तनाव है, भय है, अनिश्चितता है। इसमें खुद को और ‘सिर्फ अपनों’ को बचाने की इच्छा स्वाभाविक है लेकिन जब हम विराट फलक देखते हैं तो समझ में आता है कि वस्तुतः जब हमारा भविष्य सामूहिक है तो नियति भी उससे अलग नहीं होगी। तब दूसरों को दुख में छोड़कर अपना सुख सुरक्षित करने की कामना आपको शर्म से भर सकती है। महामारियां आपको अचानक पकड़ती हैं, जबकि आप निश्चिंत होकर अपनी योजनाओं, लाभ-हानि के खातों या अमरता के अहसास की रातों से गुजर रहे होते हैं। उन रातों में न्यूनतम आपका लक्ष्य नहीं होता, अधिकतम भी आपको न्यूनतम लगता है। तभी अचानक अनिश्चित भय से बत्ती गुल होती है और एक झटके में, अपराजेय साहस से सज्जित जीवन का प्रकाश सर्वाधिक काम्य हो उठता है। उसकी हल्की सी झलक भी, अमरता के अहसास की रातों का अप्रतिम उत्तर होती हैं। कोरोना ने हमारी बेताबी, बेईमानी, बेबाकी – सबका परीक्षण करने का मौका दिया है। सरकारों, व्यवस्था तंत्रों, धनिकों, विद्वानों, अज्ञानियों, अर्थशास्त्रियों, दानियों, स्वार्थियों – सबके लिए विलक्षण ‘एकांत’ है। कई ब्रांड कोरोना में हाथ धो रहे हैं, कई सपनों के सौदागार आपके एकांत को खुशनुमा बनाने के लिए ‘भारी छूट’ के ऑफर पर उतर आए हैं। कोरोना-नमस्कार से लेकर कोरोना-ध्यान तक धुंधाधार चल रहा है। यह धुआं आपके एकांत को बाजार से अनुपस्थिति कर दिए गए शोर से भर देना चाहता है। गोया, हलचल से जो दूरी कोरोनाई डर ने बनाई है, उसका मुकाबला एकांत में इस तरह से किया जा रहा है जैसे भारी बारिश में पकौड़े का आनंद उठाते हुए, सामने की झोपड़ी के पानी में बह जाने पर चिंता खर्च की जाए। दूरी का मतलब असामाजिक होना नहीं है। इस दूरी का मतलब ज्यादा करीब आने की राह खोलना है। कल एक शहर की गलियों में एक विदेशी को लोग पत्थर मार कर भगा रहे थे कि ‘कहीं कोरोना हो’। एक पति-पत्नी अपने बच्चे के साथ कार में रातें गुजार रहे हैं क्योंकि विदेश से लौटे हैं तो कोई घर या कॉलोनी में घुसने देने तक को तैयार नहीं है। कोरोना-ग्रस्त अस्पताल से भाग जाएं या ‘क्वारंटीन’ का मतलब निष्कासन हो जाए, यह तो पराकाष्ठा ही है। जब आपकी जान बचाने के लिए आपके थूकने पर जुर्माने की व्यवस्था करनी पड़े तो ये जान किसकी है? सैनिटाइजर के दाम बीस गुना करके बेचने वाले अपनी आत्मा को ‘सैनिटाइज’ करने के बारे में कैसे सोच सकते हैं? ऐसे में रतलाम के एक मित्र से खबर आई है। वहां का एक युवा डॉक्टर चीन में था। कोरोना की खबरें सुनत ही मां ने यहां से फोन किया कि तुरंत लौट आओ। मगर बेटे ने चीन से लौटने की बजाय कर्तव्य चुना। उसने सीधे वुहान जाकर अपनी सेवाएं देने की पेशकश की। वह और उसकी पत्नी दोनों, वुहान के क्वारंटीन वार्ड में लगे हुए हैं। मां को वीडियो कॉल पर उसका चेहरा दिखता है तो वह खिलकर कहता है, आज कितनों की सांसें बच गईं। डॉक्टर का नाम अमीश है। यही, कोरोना का प्राप्य है। प्रिय चेहरे, प्यार भरे दिल की गरमी और कोई जादू – यही तो जीवन को चाहिए। ‘कोरोना’ से हम गुजर रहे हैं। जो सीखेंगे तो, वही चीज फिर जादू सी लगेगी। जिसे हम आम दिनों में यूं ही बिखेर देते आए हैं। जब सब सुखी हों तो, अपना दुख भी छोटा लगेगा। वर्ना तो सिर्फ अपना सुख हासिल करने में शर्म ही होनी चाहिए। ठीक है ना रैम्बर्त?


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